गणेश चतुर्थी 2022 तिथि, मुहूर्त | Ganesh Chaturthi 2022 Date, Time

Ganesh Chaturthi 2022 kab hai – गणेश चतुर्थी का त्योहार हिंदू एवं बहुत से अन्य समुदाय के लोगों द्वारा पूरी दुनिया में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। गणेश जी भगवान शंकर और माता पार्वती के बेटे हैं। जिन्हें 108 नामों से जाना जाता है। सभी देवताओं में सबसे पहले भगवान गणेश की ही पूजा की जाती है।

भगवान गणेश को विनायक और विघ्नहर्ता के नाम से भी बुलाया जाता है। गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि का दाता भी माना जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी की मूर्ति को घर पर लाया जाता है। हिंदू धर्म के मुताबिक, किसी भी शुभ काम को करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। गणेश उत्सव भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतर्दर्शी तक यानी दस दिनों तक चलता है।

इसके बाद चतुर्दशी को इनका विसर्जन किया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणेश चतुर्थी की शुरुआत वैदिक भजनों, प्रार्थनाओं और हिंदू ग्रंथों जैसे गणेश उपनिषद से होती है। प्रार्थना के बाद गणेश जी को मोदक का भोग लगाकर, मोदक को लोगो में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

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गणेश चतुर्थी 2022 तिथि, मुहूर्त (Ganesh Chaturthi 2022 Date, Time)

गणेश चतुर्थी 2022 (Ganesh Chaturthi 2022): 31 अगस्त, 2022 (बुधवार)
गणेश पूजन के लिए मध्याह्न मुहूर्त: 11:04:43 से 13:37:56 तक
अवधि: 2 घंटे 33 मिनट
समय जब चन्द्र दर्शन नहीं करना है: 15:35:21 से 20:38:59 तक 30 अगस्त को; 09:26:59 से 21:10:00 तक 31 अगस्त को

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है? (Why Ganesh Chaturthi is celebrated)

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को श्री गणेश जी का जन्म हुआ था इसीलिए हर साल इस दिन गणेश चतुर्थी धूमधाम से मनाई जाती है। भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन, भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। यह मान्यता है कि भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश का जन्म हुआ था। ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है।

इस दिन लोग उत्सव के लिए विभिन्न प्रकार के भोजन तैयार करते हैं। हिंदू धर्म में गणेश जी की पूजा करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें खुशी, ज्ञान, धन और लंबी आयु प्राप्त होगी। और उनकी सभी मनोकामना पूरी होती है। गणेश जी का यह जन्मोत्सव चतुर्थी तिथि से लेकर दस दिनों तक चलता है। अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश जी की प्रतिमा विसर्जन के साथ यह उत्सव संपन्न होता है। महाराष्ट्र में यह त्यौहार विशेष रूप से लोकप्रिय होता है।

गणेश चतुर्थी को चंद्रमा को क्यों नहीं देखते हैं?

करवा चौथ से लेकर गणेश चतुर्थी जैसे तमाम व्रत एवं त्योहार चंद्रमा पर आधारित होते हैं। यानी चांद निकलने पर ही इन व्रत और त्योहारों की पूजा संपन्न होती है। यहां तक कि चतुर्थी को चंद्रमा को देखना अशुभ माना जाता है। कहा जाता है भगवान गणेश ने चांद को एक बार श्राप दिया था चतुर्थी के दिन जो भी तुझे देखेगा उस पर कलंक लगेगा। तब से लोग चतुर्थी का चांद नहीं देखते हैं।

गणेश चतुर्थी की कथा (Ganesh Chaturthi Katha)

गणेश चतुर्थी की कथा (Ganesh Chaturthi Katha) में जन्म कथा और व्रत कथा (Ganesh Chaturthi Vrat Katha) इस प्रकार है:

जन्म कथा

एक दिन स्नान करने के लिए भगवान शंकर कैलाश पर्वत से भोगावती जगह पर गए। कहा जाता है कि उनके जाने के बाद मां पार्वती ने घर में स्नान करते समय अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया था। उस पुतले को मां पार्वती ने प्राण देकर उसका नाम गणेश रखा। पार्वती जी ने गणेश से मुद्गर लेकर द्वार पर पहरा देने के लिए कहा। पार्वती जी ने कहा था कि जब तक मैं स्नान करके बाहर ना आ जाऊं किसी को भी भीतर मत आने देना।

भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव वापस घर आए तो वे घर के अंदर जाने लगे लेकिन बाल गणेश ने उन्हें रोक दिया। क्योंकि गणपति माता पार्वती के के अलावा किसी को नहीं जानते थे। ऐसे में गणपति द्वारा रोकना शिवजी ने अपना अपमान समझा और भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया और घर के अंदर चले गए। शिवजी जब अंदर पहुंचे वे बहुत क्रोधित थे। पार्वती जी ने सोचा कि भोजन में विलम्ब के कारण महादेव क्रुद्ध हैं।। इसलिए उन्होंने तुरंत 2 थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया और भोजन करने का आग्रह किया।

दूसरी थाली देखकर शिवजी ने पार्वती से पूछा, कि यह दूसरी थाली किसके लिए लगाई है? इस पर पार्वती कहती है कि यह थाली पुत्र गणेश के लिए, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है। यह सुनकर भगवान शिव चौंक गए और उन्होने पार्वती जी को बताया कि जो बालक बाहर पहरा दे रहा था, मैने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया है। यह सुनते ही माता पार्वती दुखी होकर विलाप करने लगीं। जिसके बाद उन्होंने भगवान शिव से पुत्र को दोबारा जीवित करने का आग्रह किया।

तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। पुत्र गणेश को पुन: जीवित पाकर पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं। यह पूरी घटना जिस दिन घटी उस दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी थी। इसलिए हर साल भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है।

गणेश चतुर्थी व्रत की कथा (Ganesh Chaturthi Vrat Katha)

गणेश जन्म के साथ ही चतुर्थी के व्रत के महत्व को दर्शाने वाली भी एक कथा है जो कि इस प्रकार है। होता यूं है कि माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने का प्रस्ताव किया। अब इस प्रस्ताव को भगवान शिव ने सहर्ष स्वीकार भी कर लिया लेकिन संकट की स्थिति यह थी कि वहां पर कोई हार-जीत का निर्णय करने वाला नहीं था। भगवान शिव ने जब यह शंका प्रकट की तो माता पार्वती ने तुरंत अपनी शक्ति से वहीं पर घास के तिनकों से एक बालक का सृजन किया और उसे निर्णायक बना दिया।

तीन बार खेल हुआ और तीनों बार ही माता पार्वती ने बाजी मारी लेकिन जब निर्णायक से पूछा गया तो उसने भगवान शिव को विजयी घोषित कर दिया। इससे माता पार्वती बहुत क्रोधित हुई और उन्होंनें बालक को एक पैर से अपाहिज होने एवं वहीं कीचड़ में दुख सहने का शाप दे दिया। बालक ने बड़े भोलेपन और विनम्रता से कहा कि माता मुझे इसका ज्ञान नहीं था मुझसे अज्ञानतावश यह भूल हुई, मेरी भूल माफ करें और मुझे इस नरक के जीवन से मुक्त होने का रास्ता दिखाएं।

बालक की याचना से माता पार्वती का मातृत्व जाग उठा उन्होंनें कहा कि जब यहां नाग कन्याएं गणेश पूजा के लिये आयेंगी तो वे ही तुम्हें मुक्ति का मार्ग भी सुझाएंगी। ठीक एक साल बाद वहां पर नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिये आयीं। उन नाग कन्याओं ने बालक को श्री गणेश के व्रत की विधि बतायी। इसके पश्चात बालक ने 12 दिनों तक भगवान श्री गणेश का व्रत किया तो गणेश जी ने प्रसन्न होकर उसे ठीक कर दिया जिसके बाद बालक शिवधाम पंहुच गया। जब भगवान शिव ने वहां पंहुचने का माध्यम पूछा तो बालक ने भगवान गणेश के व्रत की महिमा कही। उन दिनों भगवान शिव माता पार्वती में भी अनबन चल रही थी।

मान्यता है कि भगवान शिव ने भी गणेश जी का विधिवत व्रत किया जिसके बाद माता पार्वती स्वयं उनके पास चली आयीं। माता पार्वती ने आश्चर्यचकित होकर भोलेनाथ से इसका कारण पूछा तो भोलेनाथ ने सारा वृतांत माता पार्वती को कह सुनाया। माता पार्वती को पुत्र कार्तिकेय की याद आ रही थी तो उन्होंनें भी गणेश का व्रत किया जिसके फलस्वरुप कार्तिकेय भी दौड़े चले आये। कार्तिकेय से फिर व्रत की महिमा विश्वामित्र तक पंहुची उन्होंनें ब्रह्मऋषि बनने के लिये व्रत रखा। तत्पश्चात गणेश जी के व्रत की महिमा समस्त लोकों में लोकप्रिय हो गयी।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि (Ganesh chaturthi Puja Vidhi)

  • गणेश चतुर्थी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान करके गणपति के व्रत का संकल्प लें।
  • इसके बाद गणपति की मूर्ति या फिर उनका चित्र लाल कपड़े के ऊपर रखें।
  • फिर गंगाजल छिड़कने के बाद भगवान गणेश का आह्वान करें।
  • एक पान के पत्ते पर सिन्दूर में हल्का सा घी मिलाकर स्वास्तिक चिन्ह बनायें, उसके मध्य में कलावा से पूरी तरह लिपटी हुई सुपारी रख दें।
  • भगवान गणेश को पुष्प, सिंदूर, जनेऊ और दूर्वा (घास) चढ़ाए।
  • इसके बाद गणपति को मोदक लड्डू चढ़ाएं,
  • गणेश जी को दक्षिणा अर्पित कर उन्हें 21 लड्डूओं का भोग लगाएं।
  • मंत्रोच्चार से उनका पूजन करें।
  • गणेश जी की कथा पढ़ें या सुनें, गणेश चालीसा का पाठ करें।
  • धूप, दीप और अगरबत्‍ती से भगवान गणेश की आरती करें।
  • प्रसाद में लड्डू का वितरण करें।
  • शाम के समय चांद के निकलने से पहले गणपति की पूजा करें और संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें।
  • पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद बांटें।
  • रात को चांद देखने के बाद व्रत खोला जाता है और इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूर्ण होता है।

गणेश मंत्र (Ganesh Mantra)

पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करें:

  • ऊं गं गणपतये नम: मंत्र का जाप करें।
  • ॐ नमो गणपतये कुबेर येकद्रिको फट् स्वाहा
  • ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात।।
  • गं क्षिप्रप्रसादनाय नम:
  • ॐ ग्लौम गौरी पुत्र, वक्रतुंड, गणपति गुरु गणेश
    ग्लौम गणपति, ऋदि्ध पति। मेरे दूर करो क्लेश।।

गणपति विसर्जन (Ganpati Visarjan)

  • गणपति विसर्जन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना गणेश चतुर्थी।
  • विसर्जन का समापन ‘उत्तरापूजा’ नामक अनुष्ठान के साथ होता है।
  • जिसके बाद, भगवान गणेश की प्रतिमा को पानी में डुबोया जाता है और आशीर्वाद मांगा जाता है।
  • भक्त समुद्र में विसर्जित की जाने वाली मूर्तियों को ले जाते समय गणपति बप्पा मोरया जैसे नारे लगाते हैं।
  • गणेश चतुर्थी के 7 वें, 5 वें या तीसरे दिन गणेश विसर्जन भी किया जा सकता है।

गणेश चतुर्थी का महत्व (Importance of Ganesh Chaturthi)

  • इस दिन पूजा व व्रत करने से व्यक्ति को झूठे आरोपों से मुक्ति मिलती है।
  • भारतीय संस्कृति में गणेश जी को विद्या-बुद्धि का प्रदाता, विघ्न-विनाशक, मंगलकारी, रक्षाकारक, सिद्धिदायक, समृद्धि, शक्ति और सम्मान प्रदायक माना गया है।
  • अगर मंगलवार को यह गणेश चतुर्थी आए तो उसे अंगारक चतुर्थी कहते हैं। जिसमें पूजा व व्रत करने से अनेक पापों का शमन होता है।
  • अगर रविवार को यह चतुर्थी पड़े तो भी बहुत शुभ व श्रेष्ठ फलदायी मानी गई है।
  • इस दौरान गणेश जी को भव्य रूप से सजाकर उनकी पूजा की जाती है।
  • अंतिम दिन गणेश जी की ढोल-नगाड़ों के साथ झांकियाँ निकालकर उन्हें जल में विसर्जित किया जाता है।
  • इस त्यौहार को बड़ा पवित्र और महान फल देने वाला बताया गया है।

गणेश चतुर्थी कैसे मनाते हैं? (How to celebrate Ganesh Chaturthi 2022)

गणेश चतुर्थी उत्सव के लिए तैयारियां लगभग एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती हैं। खासकर महाराष्ट्र में यह उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान गणेश की मूर्तियां बनाई जाती हैं जो खासतौर पर मिट्टी से निर्मित होती हैं। लोग गणेश जी की भव्य प्रतिमा वाले पंडाल को आदर्श बनाने के लिये अपने अपने पंडाल को फूल, माला, बिजली की रोशनी आदि का उपयोग कर सजाते हैं।

मंदिरों के पुजारी शॉल के साथ लाल या सफेद धोती पहनकर मंत्रों का जाप करते हैं और प्रार्थना करते हैं। भक्त लोग भक्ति गीत, नृत्य, हरी घास के फूल, फल, घी दीया, दूब, मिठाई, मोदक, धूप-बत्ती, कपूर, आदि अर्पित करते हैं। भक्त पूरी प्रतिमा के शरीर के पर कुमकुम और चंदन का लेप लगाते हैं। गणेश उत्सव का यह समारोह 1, 3, 5, 7 या 11 दिनों के बाद नदी, समुद्र आदि की तरह बड़े पानी के स्रोत में भगवान गणेश की प्रतिमा के विसर्जन पर समाप्त होता है।

भारत में भगवान गणेश के प्रसिद्ध मंदिर (India’s Famous Ganesha Temple List)

भारत में भगवान गणेश के प्रसिद्ध मंदिर इस प्रकार हैं:

  • गणपति पुले कोंकण तट
  • सिद्धी विनायक
  • रणथम्भौर
  • कर्पगा विनायक
  • रॉक फोर्ट उच्ची पिल्लायर तिर्रुचिल्लापली
  • मनाकुला विनयागर
  • मधुर महा गणपति मंदिर
  • ससिवे कालू कदले गणेशा
  • गणेश टोक
  • दगडूशेठ
  • मोती डूंगरी
  • मंडई गणपति
  • खड़े गणेश जी
  • स्वयंभू गणपति
  • खजराना

गणेश चतुर्थी निबंध हिंदी (Ganesh Chaturthi par nibandh)

गणेश चतुर्थी उत्सव वर्षाऋतु का एक प्रमुख पर्व है। वर्षा के मस्त मौसम में गणेशोत्सव की धूम-धाम चार चाँद लगा देती है। यह उत्सव मुख्य रूप से महाराष्ट्र में मनाया जाता है। इस उत्सव को व्यस्थित रूप देने का श्रेय लोकमान्य तिलक को है।

यह उत्सव भादों महीने के शुक्लपक्ष में चतुर्थी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है। चतुर्थी के दिन लोग बड़ी धूम-धाम से गनेश की मूर्तियाँ अपने घर लाते हैं। सुंदर, रंगीन मूर्तियाँ सजी हुई गाड़ियों में या सर में रख के लाई जाती हैं। संगीत की धुनों के साथ “गणपति बाप्पा मोरिया” की ध्वनि से वातावरण गूंज उठता है। घर में भगवान गणेश की सुंदर, स्वच्छ, सजे हुए स्थान पर प्रतिमा रखी जाती है। सार्वजनिक रूप से भी गणेशोत्सव मनाया जाता है।

गणेश चतुर्थी उत्सव उत्सव के दिनों में शाम की रोनक देखते ही बनती है। श्रद्धा और भक्ति से भगवान गणेश की आरती उतारी जाती है और प्रसाद बनाया जाता है। भजन-कीर्तन करते हुए लोग भक्ति-भाव से झूम उठते हैं। रात को कहीं संगीत के कार्यक्रम होते हैं, कही नाटक होता है, तो कही फ़िल्में दिखाई जाती हैं।

चतुर्दशी के दिन गणपति की भव्य नगरयात्रा निकलती है और उनका विसर्जनहोता है। ठेलागाड़ियों या ट्रकों पर साजसज्जा के साथ गणेशजी की प्रतिमाएँ नदी या समुद्र की ओर ले जाई जाती है। नाच-गान के साथ लोग जब “गणपति बाप्पा मोरिया, पुढच्या वर्षी लवकर या” गाते हैं, तब दिल भी नाच उठता है। लोगों की ख़ुशी और मस्ती का ठिकाना नहीं रहता है। समुद्र-तट पर विसर्जनं का दृश्य बड़ा मनमोहक होता है। गणपति-विसर्जन के साथ ही यह उत्सव भी समाप्त हो जाता है।

गणेशोत्सव केवल धर्मिक उत्सव ही नहीं है, यह सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। यह उत्सव लोगों को एक सूत्र में बांधता है। गणेशजी विघ्नहर्ता और रिद्धि-सिद्दी के देवता हैं। उनका यह उत्सव मनाकर हम अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने की कामना करते हैं।

गणेश चतुर्थी पर शायरी (Ganesh Chaturthi Shayari in Hindi)

आते बड़े धूम से गणपति जी,
जाते बड़े धूम से गणपति जी,
आखिर सबसे पहले आकर,
हमारे दिलों में बस जाते गणपति जी।
हैप्पी गणेश चतुर्थी!!!
पार्वती का लाडला, शिवजी के प्यारे…
लडुअन खा के जो मुसिक सवारे,
वो है जय गणेश देवा हमारे।
हैप्पी गणेश चतुर्थी…
गणेश की ज्योति से नूर मिलता है,
सबके दिलों को सुरूर मिलता है,
जो भी जाता है गणेश के द्वार,
कुछ ना कुछ जरूर मिलता है।
सुख मिले सम्रिधि मिले, 
मिले खुशी अपार, 
आपका जियाँ सफल हो 
जब आए गणेश जी आपके द्वार।
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें
खुशियो की सौगात आए, 
गणेश जी आपके पास आए, 
आपके जीवन मे आए सुख संपाति की बहार 
जो गणेश जी अपने साथ लाए
चलो खुशियो का जाम हो जाए, 
लेके बप्पा का नाम कुछ अच्छे काम हो जाए, 
खुशिया बाँट के हर जगह 
आज का दिन बप्पा के नाम हो जाए

गणेश चतुर्थी से सम्बंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (Ganesh Chaturthi 2022 FAQs)

गणेश चतुर्थी के पीछे की कहानी क्या है?

ऐसी मान्यता है कि पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव द्वारा पुत्र गणेश को पुन: जीवित किया गया। यह पूरी घटना जिस दिन घटी उस दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी थी। इसलिए हर साल भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है।

गणेश चतुर्थी कब है?

गणेश चतुर्थी 2022 में बुधवार, 31 अगस्त को है। गणेश उत्सव भाद्रपद मास की चतुर्थी से चतर्दर्शी तक यानी दस दिनों तक चलता है। गणेश चतुर्थी को भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।

गणेश चतुर्थी क्यों मनाया जाता है?

भगवान गणेश के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है।

गणेश चतुर्थी की शुरुआत कैसे हुई?

इतिहास के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि गणेश चतुर्थी को 1630-1680 के दौरान छत्रपति शिवाजी (मराठा साम्राज्य के संस्थापक) के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी के समय यह गणेशोत्सव उनके साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू किया गया था। साल 1893 में बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक (एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक) द्वारा पुनर्जीवित किया गया।

गणेश चतुर्थी कब मनाई जाती है?

गणेश चतुर्थी भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। पूरे भारत में गणेश चतुर्थी से लेकर अगले दस दिनों तक जमकर उत्साह देखा जाता है। कुछ लोग गणेशोत्सव को 2 दिन के लिए मनाते हैं तो कुछ लोग पूरे दस दिनों तक इस उत्सव का आनंद उठाते हैं।

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